नई दिल्ली। देश में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं तथा वोट चोरी के आरोपों को लेकर राजनीतिक बहस के बीच सार्वजनिक सुनवाई ‘जनता की अदालत’ का आयोजन किया गया। इस सुनवाई में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी प्रस्तुति रखी, जबकि लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने इसकी अध्यक्षता की।
इस सार्वजनिक सुनवाई में सांसदों, सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों, छात्र संगठनों और विभिन्न सामाजिक समूहों के सदस्यों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा ऐसे लोग भी शामिल हुए, जिन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और वोटर पहचान से जुड़ी समस्याओं के कारण उनके लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हुए हैं।

सुनवाई का मुख्य उद्देश्य मतदाता अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की भागीदारी से जुड़े सवालों को सार्वजनिक मंच पर उठाना बताया गया।
खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पेश किया जन-महाभियोग प्रस्ताव
कार्यक्रम की शुरुआत में मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह प्रमुख आरोपों को सामने रखते हुए प्रस्ताव पेश किया। विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए और इससे करोड़ों मतदाताओं के मतदान अधिकार प्रभावित हुए हैं।
खरगे ने अपने संबोधन में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत देश के नागरिकों को प्राप्त सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आज गंभीर खतरे में है। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता का अधिकार सर्वोपरि होना चाहिए।
विपक्ष की ओर से लगाए गए छह प्रमुख आरोपों में चुनावी प्रक्रिया में कथित हेरफेर, एसआईआर के दौरान 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का दावा, संसद की मंजूरी के बिना फॉर्म-6 में बदलाव, ईसीआईनेट के माध्यम से मतदाता सूची पर नियंत्रण, अन्य दो चुनाव आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया से अलग रखने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों पर काम करने के आरोप शामिल हैं। ये सभी विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
मीरा कुमार ने संभाली अध्यक्ष की भूमिका
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने पूरी कार्यवाही की अध्यक्षता की। कार्यक्रम को संसद की कार्यवाही की तर्ज पर आयोजित किया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने प्रस्ताव पेश किया और इसके बाद विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं तथा अन्य प्रतिभागियों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया।
मीरा कुमार ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि यदि किसी एक वैध मतदाता को भी मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के लिए गंभीर विषय है।
जिनके नाम मतदाता सूची से हटे, उन्होंने सुनाई अपनी पीड़ा
इस सार्वजनिक सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू उन लोगों की भागीदारी रही, जिन्होंने मतदाता सूची से अपना नाम हटाए जाने की शिकायत की है। ऐसे लोगों ने अपनी पहचान, नागरिक अधिकार और मतदान के अधिकार से जुड़े अनुभव साझा किए।
दिल्ली में रहने वाली अनीता जायसवाल ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि वह लंबे समय से दिल्ली में रह रही हैं और वर्ष 2012 से उनका मतदाता पहचान पत्र बना हुआ था। इसके बावजूद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने प्रशासन से अपनी नागरिकता और पहचान से जुड़े संदेहों का स्पष्ट जवाब देने की मांग की।
इसी तरह पश्चिम बंगाल के इफ्तिखार अहमद ने भी मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया। इन शिकायतों ने सुनवाई में मतदाता पहचान और चुनावी अधिकारों से जुड़े मानवीय पक्ष को प्रमुखता दी।
सोनिया, राहुल और विपक्षी दलों के कई वरिष्ठ नेता रहे मौजूद
इस आयोजन में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित इंडिया गठबंधन के कई वरिष्ठ नेता और सांसद शामिल हुए। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वामपंथी दलों तथा अन्य विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
सिविल सोसायटी से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और निखिल डे सहित छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे। छात्र नेता नेहा बोरा ने भी सुनवाई में भाग लेते हुए कहा कि यदि संसद में जनता की आवाज सुनी जाती तो इस तरह की सुनवाई की जरूरत नहीं पड़ती।
राहुल गांधी ने उठाया लोकतंत्र और संविधान का सवाल
कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के अभियान को लोकतंत्र और संविधान की रक्षा से जुड़ा राजनीतिक संघर्ष बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के जरिए जनता के मतदान अधिकार को प्रभावित किया जा रहा है।
विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कायम रहना चाहिए। इसके लिए आयोग को पारदर्शी तरीके से काम करना होगा और मतदाता सूची से जुड़े प्रत्येक विवाद का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित करना होगा।
प्रतीकात्मक जन-महाभियोग प्रस्ताव पारित करने की पहल
सुनवाई के दौरान विपक्षी गठबंधन ने ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की मांग दोहराई। कार्यक्रम में उनके खिलाफ प्रतीकात्मक जन-महाभियोग प्रस्ताव पारित करने की पहल की गई। विपक्ष ने आरोपों की जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खरगे के आवास पर आयोजित यह जन-महाभियोग एक प्रतीकात्मक राजनीतिक और सार्वजनिक सुनवाई थी। यह संसद में निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की औपचारिक कार्यवाही नहीं है।
1 नवंबर को रामलीला मैदान में होगी बड़ी रैली
जन-सुनवाई के बाद इंडिया गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ बड़ी रैली आयोजित करने की तैयारी की है। गठबंधन का उद्देश्य मतदाता अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और एसआईआर से जुड़े विवादों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है।
विपक्षी दलों ने इस अभियान के माध्यम से जनता के बीच यह सवाल पहुंचाने की कोशिश की है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है तथा प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए।