मुंबई/महाराष्ट्र : चेंबूर के माहुल क्षेत्र में, टाटा कंपनी के पीछे स्थित पीर पाऊं जेटी के निकट समुद्र तट पर, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (MbPT) से पट्टे पर प्राप्त तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के अंतर्गत आने वाली समुद्री भूमि पर AEGIS कंपनी द्वारा प्रस्तावित रासायनिक भंडारण टर्मिनल परियोजना को लेकर गंभीर पर्यावरणीय और विधिक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, उक्त परियोजना का निर्माण कार्य पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 एवं उससे संबंधित तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए प्रारंभ किया गया था।
यह विषय महाराष्ट्र राज्य विधानसभा के सत्र के दौरान विधायक सना मलिक शेख द्वारा प्रमुखता से उठाया गया, जिसके उपरांत विधानसभा के उपाध्यक्ष ने संज्ञान लेते हुए AEGIS कंपनी को निर्देश जारी किए हैं कि वह परियोजना स्थल पर अवैध रूप से डाली गई लाखों मीट्रिक टन मिट्टी एवं मलबे को तत्काल हटाए, ताकि प्रभावित पर्यावरण, मैन्ग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र एवं समुद्री जैव विविधता को पूर्ववत स्थिति में बहाल हो सके।
पर्यावरण अधिवक्ता संदीप शुक्ला सहित विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा AEGIS कंपनी, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट तथा संबंधित विभागों को विधिक नोटिस जारी किए गए हैं। साथ ही, इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), पुणे पीठ में याचिका दायर करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि उक्त परियोजना बिना अनिवार्य पर्यावरणीय स्वीकृतियों एवं वैधानिक अनुमतियों के आरंभ की गई, जो न केवल अवैध है, बल्कि आपराधिक प्रकृति का भी दंडनीय कृत्य है।

सूत्रों के अनुसार, RCF पुलिस थाना क्षेत्र में स्थित इस समुद्री भूभाग में अवैध रूप से वृक्षों की कटाई, समुद्र में भराव, खुदाई एवं ड्रिलिंग जैसी गतिविधियाँ की गई हैं, जिससे आरक्षित वन क्षेत्र को अपूरणीय क्षति पहुँची है। इसके चलते भारतीय दंड संहिता (IPC) एवं पर्यावरणीय अधिनियमों के अंतर्गत FIR दर्ज किए जाने की मांग तेज होती जा रही है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप है कि ये समस्त कार्य AEGIS कंपनी और MbPT अधिकारियों की मिलीभगत से संपन्न हुए हैं। साथ ही, उन्होंने MPCB (महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल), BMC, जिलाधिकारी कार्यालय, वन एवं मैन्ग्रोव सेल, MCZMA (महाराष्ट्र तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण) तथा MOEFCC (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) पर कर्तव्यों की घोर उपेक्षा और स्वीकृतियों में अनावश्यक अनदेखी का आरोप लगाया है।

यह भी संदेह जताया गया है कि परियोजना के लिए आवश्यक पूर्व अनुमतियाँ प्राप्त किए बिना निर्माण कार्य आरंभ करना, और पश्चातवर्ती चरणों में अनियमित रूप से अनुमति प्राप्त करने का प्रयास करना, न केवल विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधानिक नैतिकता के भी प्रतिकूल है।
इसके अतिरिक्त, समुद्र तटीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध मिट्टी भराव जैसे गंभीर अपराध में AEGIS कंपनी द्वारा नियुक्त ठेकेदारों और स्थानीय “मिट्टी माफिया” की संलिप्तता की भी जांच की मांग उठाई जा रही है। संबंधित एजेंसियों द्वारा इन सभी पक्षों की भूमिका की गहन जांच कर शीघ्र ही उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई या अभियोग तय किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
अब यह देखना शेष है कि संबंधित प्रशासनिक एवं विधिक संस्थाएं — विशेष रूप से स्थानीय पुलिस प्रशासन, जिलाधिकारी, वन विभाग एवं तटीय प्रबंधन प्राधिकरण, प्रदूषण मंडल — इस प्रकरण में कितनी शीघ्रता और प्रभावशीलता से दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।
वहीं, यह भी अपेक्षित है कि AEGIS कंपनी इन गंभीर पर्यावरणीय एवं विधिक आरोपों के संदर्भ में उत्तरदायित्व स्वीकार कर नियमानुसार जवाबदेही तय करे — या फिर संवैधानिक मंचों पर उचित प्रतिवाद प्रस्तुत कर अपना पक्ष रखे