शिव श्रमिक कामगार संघटन के महासचिव त्रिलोकीनाथ शुक्ला ने लगाया आरोप, जांच और कार्रवाई की मांग
मुंबई : बृहन्मुंबई महानगरपालिका के तहत शिक्षा विभाग सहित कई अन्य सरकारी संस्थानों की सुरक्षा की जिम्मेवारी स्मार्ट सर्विसेस प्रा. लि. ( पुराना नामः ब्रिस्क इंडिया प्रा. लि., पुणे मुख्यालय) को एक टेंडर के माध्यम से दी गई है। लेकिन, स्मार्ट सर्विसेस की ओर से सुरक्षा के नाम पर फर्जीवाड़ा किया जा रहा है और इस फर्जीवाड़ा से लाखों रुपए का घोटाला किया जा रहा है। इस फर्जीवाड़ा में मनपा के अधिकारियों के शामिल होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

इस फर्जीवाड़ा का खुलासा त्रिलोक विवेचना के संपादक एवं शिव श्रमिक कामगार संघटन के महासचिव संदीप त्रिलोकीनाथ शुक्ला की ओर से मांगी गई आरटीआई सूचना के दस्तावेजों से हो रहा है।
संदीप त्रिलोकीनाथ शुक्ला ने इस पूरे मामले में संबंधित कामगारों, इंडी, मुंबई आयुक्त, मुंबई पुलिस आयुक्त, मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री, पीएफ, ईएसआईसी आदि को जांच कर कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा है। शुक्ला का कहना है कि चूंकि यह मामला सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों खासकर महिलाओं और छात्रों का अमानवीय शोषण और सार्वजनिक धन की लूट है। मनपा को जल्द से जल्द उक्त टेंडर को रद्द कर देना चाहिए। इसके साथ ही फील्ड वेरिफिकेशन करना, फर्जी PCC और दस्तावेजों की जांच करना, अनुपालन सुनिश्चित करना, इंडी सीएलआरए/पीएसएआरए जांच पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।

क्या है पूरा मामला
त्रिलोकीनाथ शुक्ला के आरटीआई दस्तावेज के अनुसार बृहन्मुंबई महानगरपालिका के अंतर्गत शिक्षण विभाग के स्कूलों और सुरक्षा विभाग में हजारों अटेंडेंट और सुरक्षा कर्मचारी तैनात किए जाते हैं, जो लाखों छात्रों और नागरिकों की सुरक्षा और रोजमर्रा की व्यवस्था के लिए जिम्मेदार होते हैं। लेकिन वर्तमान में चल रहे एक बड़े करार (टेंडर आईडी नंबर 2024 एमसीजीएम_1027937 1) के काम में फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है। दस्तावेज के अनुसार, स्मार्ट सर्विसेस प्रा. लि. (पहले का नामः ब्रिस्क इंडिया प्रा. लि., पुणे मुख्यालय) को मनपा ने शिक्षा और सुरक्षा विभाग द्वारा तीन साल के लिए अटेंडेट-सुरक्षा कर्मचारियों की सेवा देने का करार दिया है। इस करार में 1 ,500 से ज्यादा कर्मचारी शामिल हैं, इसका वार्षिक मूल्य लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक है। उपलब्ध सबूतों (आरटीआई जवाब, हस्तलिखित वेतन रिकॉर्ड, बैंक एसएमएस अलर्ट, ड्यूटी रोस्टर एक्सेल फाइल) के अनुसार, इस करार में कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) एक्ट, 1970 (सीएलआरए) और प्राइवेट सिक्योरिटी एजेसीज (रेगुलेशन) एक्ट, 2005 (पीएसएआरए) का लगातार और गंभीर उल्लंघन हो रहा है।
सीएलआरए एक्ट के अनुसार, 20 या इससे ज्यादा मजदूरों वाली जगह पर मुख्य नियोक्ता (मनपा) को रजिस्ट्रेशन और ठेकेदार को लाइसेंस लेना अनिवार्य है (धारा 7 और 12) है। लेकिन इस करार में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों से लाए गए मजदूरों का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है। अटेंडेंस रजिस्टर, मास्टर रोल, वेतन रजिस्टर, कुछ भी ठीक से मेंटेन नहीं किया जाता। इस मामले में सबसे चौकाने वाली और अमानवीय बात यह है कि इस “सुरक्षा-अटेंडेट सेवा” में असली ट्रेंड सिक्योरिटी गार्ड काम नहीं करते, बल्कि पान टपरी चलाने वाले, मेडिकल स्टोर चलाने वाले दुकानदार, वकील, कॉलेज में पढ़ाई करने वाले छात्र और घर में रहने वाली गृहिणियां भी काम कर रही हैं। इन गृहिणियों को यह भी पता नहीं होता कि वे किस साइट पर “काम” कर रही हैं।
उनके बैंक खाते में अधिकतम 18 ,000 रुपये वेतन आता है, लेकिन कंपनी के सुपरवाइजर द्वारा तुरंत 17 ,000 रुपये वापस ले लिया जाता है जिसे “कंपनी को लौटाने हैं।
इन कामगारों की पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट (PCC) कैसे प्राप्त की गई, जो इस दुनिया में ही नहीं हैं या अन्य राज्यों में रह रहे हैं? पुलिस अधिकारियों को प्रत्यक्ष पुरावा लेकर कब और कहाँ मिला जब उनकी PCC क्लियरेस की गई? इसमें से कितने के 10 वीं पास के सर्टिफिकेट ही फर्जी तैयार किए गए हैं? साइट पर उपस्थित होने का फेक GPS फोटो तैयार करके हाजिरी दिखाई जा रही है। यह जानकारी विश्वस्त सूत्रों के हवाले से मिली है। आरटीआई के जवाबों और बैंक स्टेटमेट के साथ। यह घोस्ट वर्कर्स, फर्जी दस्तावेज और फर्जी बिलिंग का सबसे बड़ा सबूत है, जिससे सरकारी खजाने को हर साल करोड़ों का फटका लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लि. बनाम नेशनल यूनियन वॉटरफ्रंट वर्कर्स (20001 एआईआर 3527) और गैमन इंडिया लि. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1974 एआईआर 960) जैसे मामलों में ऐसे शोषण की कड़ी निंदा की है।
सुरक्षा को खतरा
सुरक्षा सेवा देने के लिए पीएसएआरए लाइसेंस अनिवार्य है (धारा 4)। कंपनी का लाइसेंस 21 अप्रैल 2025 को जारी हुआ, जबकि टेंडर 2024 में दिया गया। लाइसेंस के बिना सेवा देना गैरकानूनी है। साथ ही, इन अनट्रेड और फर्जी दस्तावेज वाले लोगों को कोई ट्रेनिंग या पूर्व सत्यापन नहीं हुआ।
कंपनी का मूल नाम ब्रिस्क इंडिया प्रा. लि. था, जो 2023 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मनी लॉन्डिंग जांच से जुड़ा है (कोल्हापुर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के 845 करोड़ रुपये के लोन गवन, हसन मुशरिफ प्रकरण)। टेंडर देते समय इंडी से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) लेना जरूरी था क्या? उपलब्ध जानकारी में इसका कोई जिक्र नहीं है।
अब देखना यह है कि इस फर्जीवाड़े की जांच कैसे होती है और फर्जीवाड़े में कौन-कौन फंसता है।