नया साल मुबारक, पढ़िए निर्मला गर्ग और नागार्जुन की कविताएं

साल 2025 अब पीछे छूटा और नया साल 2026 का आगमन हो गया। नया साल सभी को मुबारक। सभी के जीवन में नया साल खुशियां लेकर आए और सभी की प्रगति हो। नए साल के आगमन पर यहां प्रस्तुत है दो प्रसिद्ध कवियों की कविताएं।

दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता

कवि – निर्मला गर्ग

दिसंबर सर्द है ज़्यादा इस बार

पहाड़ों पर बर्फ़ गिर रही है लगातार…
दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता

आख़िरी नहीं लगतीं उसकी शामें
नई भोर की गुज़र चुकी रात नहीं है यह

भूमिका है उसकी
इस सर्द महीने के रूखे चेहरे पर

यात्रा की धूल है
फटी एड़ियों में इस यात्रा की निरंतरता

दिसंबर के पास सारे महीने छोड़ जाते हैं
अपनी कोई न कोई चीज़

जुलाई बरिश
नवंबर पतझड़

मार्च सुगम संगीत
तेज़ ठंड ने फ़िलहाल धकेल दिया है सभी चीज़ों को

पृष्ठभूमि में
“पारा शून्य को छूते-छूते रह गया है”

समाचारों में बताया गया
ऐसी ही एक सुबह मैं देखती हूँ

एक तस्वीर
रात है… कुहरा छाया है

अनमना हो आया है कुहरे में बिजली का खंबा
चादर ओढ़े फ़ुटपाथ पर कोई सो रहा है

नीचे लिखा है :
जिन्हें नाज़ है हिंद पर…!

चंदू, मैंने सपना देखा

कवि – नागार्जुन

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू

चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो

चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *