लाउडस्पीकर का इस्तेमाल धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है : बॉम्बे हाई कोर्ट

महाराष्ट्र/नागपुर : बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने गोंदिया जिले की मस्जिद गौसिया की एक याचिका जिसमें मस्जिद में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की बहाली की मांग की गई थी, को खारिज करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को अनचाही आवाजें सुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए 2000 के नियमों का भी ज़िक्र किया। इन नियमों में ध्वनि प्रदूषण के स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में बताया गया है। कोर्ट ने यह भी बताया कि ध्वनि प्रदूषण से लोगों को कितनी परेशानी हो सकती है। लाउडस्पीकर से होने वाले शोर से लोगों की नींद खराब हो सकती है और वे तनाव में भी आ सकते हैं। इसलिए, कोर्ट ने इस मामले में मस्जिद की याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता मस्जिद ने ऐसा कोई कानूनी या धार्मिक दस्तावेज पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि नमाज़ के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल जरूरी है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि कोई भी धर्म दूसरों की शांति भंग करके, आवाज बढ़ाने वाले यंत्रों या ढोल बजाकर प्रार्थना करने की बात नहीं कहता। सुनवाई के दौरान, 16 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह साबित करने को कहा था कि क्या लाउडस्पीकर लगाना धार्मिक प्रथा के लिए अनिवार्य है। याचिकाकर्ता इस बात का कोई सबूत पेश नहीं कर सका। इसलिए, कोर्ट ने माना कि वे राहत पाने के हकदार नहीं हैं।

बेंच ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया था कि जहां बोलने का अधिकार है, वहीं सुनने या न सुनने का भी अधिकार है। किसी को भी सुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसे दूसरों के दिमाग में अपनी आवाज पहुंचाने का अधिकार है।

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