
अबू आजमी ने उठाए कानूनी प्रक्रिया पर सवाल
अबू आजमी ने कहा कि सहारनपुर में करीब सौ साल पुरानी मस्जिद को रात के समय तोड़ दिया गया और संबंधित पक्ष को हाईकोर्ट जाने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने इसे गलत बताते हुए कहा कि किसी भी पुरानी इमारत को गिराने से पहले संबंधित पक्ष को अदालत में अपनी बात रखने का समय मिलना चाहिए। आजमी ने आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने सहारनपुर की घटना के संदर्भ में आरएसएस पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक तरफ मोहब्बत और भाईचारे की बात की जाती है, जबकि दूसरी तरफ धार्मिक स्थल को इस तरह गिराया जा रहा है।
वारिस पठान बोले- ‘मस्जिद पर नहीं, हमारे सीने पर बुलडोजर चला’
एआईएमआईएम नेता वारिस पठान ने भी ध्वस्तीकरण की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान लोगों को पहले मस्जिद सील किए जाने की बात बताई गई, लेकिन बाद में बुलडोजर चलाकर ढांचा ध्वस्त कर दिया गया। पठान ने कहा कि लोगों को हाईकोर्ट जाने का अवसर मिलना चाहिए था। पठान ने इसे “लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन” बताते हुए आरोप लगाया कि कानून और संविधान की भावना की अनदेखी की गई। उन्होंने कहा कि मस्जिद पर नहीं बल्कि लोगों के सीने पर बुलडोजर चलाया गया।
प्रशासन का दावा- अदालती प्रक्रिया के बाद हुई कार्रवाई
हालांकि, प्रशासन और पुलिस का कहना है कि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना गया था। सिटी मजिस्ट्रेट के जुलाई के आदेश के खिलाफ मस्जिद प्रबंधन की अपील को जिला अदालत ने 2 सितंबर 2026 को खारिज कर दिया था। इसके बाद 5 सितंबर की सुबह भारी पुलिस बल की मौजूदगी में ध्वस्तीकरण किया गया। प्रशासन ने कहा है कि कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई। मस्जिद प्रबंधन ने हालांकि आरोप लगाया कि ध्वस्तीकरण में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। मामले को आगे हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात भी सामने आई है।
मलबे में मिला करीब 20 फीट गहरा कुआं
ध्वस्तीकरण के बाद घटनास्थल पर एक नया विवाद भी सामने आया। मलबा हटाने के दौरान वहां करीब 20 फीट गहरा और 1.5 मीटर चौड़ा पुराना कुआं मिला। प्रशासन अब इसकी उम्र और ऐतिहासिक महत्व की जांच के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से जांच कराने पर विचार कर रहा है। इस पूरे मामले को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ महाराष्ट्र के विपक्षी नेताओं की बयानबाजी ने भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।